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अकरकरा (अकलकरा )के फ़ायदे | Akarkara(Anacyclus Pyrethrum)

अकलकरा का सामान्य परिचय – Akarkara(Anacyclus Pyrethrum)

इसको अन्य भाषाओ में आकल्लक, अक्कलकरी, अकोरकोरा,आकरकरहा, पेलिटरीरूट आदि नामो से जाना जाता है। ये औषधि भारत एवं अफ्रीका के वनो में पाया जाता है। वर्षाऋतु में इसके पौधे उगते है। पौधे की लम्बाई लगभग एक फ़ीट होती है। इसके डाली रोयेंदार होती है और जड़ तीन से पांच इंच लम्बी और लगभग एक इंच चौड़ी होती है। पौधे की छाल मोटी और भूरी रंग की होती है। ये अपने गुण को सात वर्ष तक बनाये रखती है।

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अकलकरा के उपयोग

  • मिर्गी
    आकरकरहा मृगी में बहुत ही लाभदायक होता है। रूमी मस्तगी और अकोरकोरा के पत्तो के रस को सामान मात्रा में लेकर खरल कर ले और गाय की घी के साथ मिलाकर एक ग्राम की गोली बना कर लेने से मिर्गी में लाभदायक रहता है।
  • सर्दी, जुकाम, बुखार
    इसके पत्तो को पीसकर काढ़ा बना ले और हल्का गर्म करके सिर पर लेप करने से सर्दी जुकाम को दूर करता है और पसीना लाकर बुखार को कम करता है।
  • खांसी
    आकरकरहा के पत्तो को पीसकर काढ़ा बनाकर पीने से खांसी बंद हो जाती है लगभग दो ग्राम पत्ती को पीसकर देने से पूरा कफ निकालकर आराम देता है।
  • अतिसार
    आकल्लक के पत्तो का काढ़ा बनाकर आयु के अनुसार देने से बच्चो के दांत निकलते समय के अतिसार को दूर करता है।
  • पेट में जलन
    सोंठ और आकल्लक के जड़ को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर लेने से पेट के जलन ख़त्म हो जाती है।
  • स्नायुरोग
    आकरकरहा के पत्ते का रस पांच रत्ती की मात्रा में लेने से स्नायुरोग से सम्बंधित सभी रोग और लकवा आदि में लाभदायक रहता है।

अन्य गुण

  • आकल्लक, लौंग, कपूर, सुहागा, जायफल, तज, मालकांगनी, जायपत्री, पारा और गंधक के साथ चूर्ण बनाकर समागम से चार घंटे पूर्व लिंग पर लेप करके दो घंटे बाद धो ले और समागम करे तो काम में सुख मिलता है और गर्भ नहीं ठहरता है।
  • इसके बारीक चूर्ण को तिल के तेल में मिलाकर लगाने से कफ, खांसी और सर्दी में आराम मिलता है।

नोट:- ये औषधि जहरीली होती है। अधिक मात्रा में लेने से खून के दस्त आदि हो सकते है। इसलिए इसका उपयोग जान-समझ कर करना चाहिए।

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