अगर के गुण और उपयोग

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Agar
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यह सात से सौ फ़ीट ऊँचा एक सघन वृक्ष है। हराभरा रहता है। इसकी लकड़ी नरम होती है। कटने पर डाल या तने से राल निकलती है , जो सुगन्धित होती है। अगर की पाँच जातियाँ होती है। आयुर्वेद में इन्हें कृष्णगुरु , काष्ठागुरु , दाहागुरु , स्वाहागुरु एवं मंगलगुरु कहते है। कृष्णगुरु सिलहट के जंगलों में पाया जाता है और यही सर्वोत्तम औषधि समझी जाती है। यह पानी में डूब जाता है , चबाने पर मुलायम एवं कड़वा लगता है जलाने पर सुगंध देता है।

  • अगर के अन्य नाम
  • अगर के गुण
  • अगर के उपयोग
  • अगर के दैवीगुण

(और भीं पढ़ें – आरार (हाऊबेर) के गुण )

अगर के अन्य नाम

  • हिंदी – अगर
  • संस्कृत – अगरु , वंशिक , कृमिजम
  • फ़ारसी – उदखाम
  • अरबी – उद
  • द्राविड़ – अहिलकटटे

अगर के गुण

  • आयुर्वेद – कड़वा , गर्म लेप में शीतल , पित्त नाशक , सुगन्धित , गर्म है।
  • यूनानी – दूसरे वर्ग का गर्म , तीसरे वर्ग का रुक्ष।
Agar
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अगर के उपयोग

कुष्ठ एवं खुजली को नष्ट करनेवाला , प्यास शमन करनेवाली , शरीर की रंगत को उज्जवल करनेवाली , वालों की विधि करनेवाली , हूपिंग कफ में लाभ पहुँचानेवाली , विरेचनदायक , मुँह की बदबू हटानेवाली , अफारा दूर करनेवाली एवं त्वचा को निरोग करनेवाली औषधि है। इसका उपयोग सुगन्धित अगरबत्तियों को बनाने में तथा इत्र बनाने में भी होता है।

अगर के दैवीगुण

  • इसकी लकड़ी या छाल को काली के सामने रखकर उसकी पूजा करने के बाद पीसकर शरीर में लगाने से दिव्य कान्ति प्राप्त होती है।
  • काली की ही पूजा करके इसका चोआ पान में लगाकर खाने से अति कामोदृीपन होता है। इसका प्रयोग बाजीकरण में भीं किया जाता है।
  • हृदय रोग एवं मंदाग्नि में इसकी लकड़ी का चूर्ण शहद में पिलाने से आशातीत लाभ होता है।
  • प्रतिनिधि – दालचीनी , बालझड , देवदारु
  • गर्तनाशक – गुलाब और कपूर

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