देवदारु के गुण और उपयोग

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Devdaru
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देवदारु का वृक्ष हिमालय नेपाल , कुमाऊँ और कश्मीर में विशेष पैदा होता है। यहाँ पर यह केलोन के नाम से प्रसिद्ध है। यह बड़ा वृक्ष है। इसकी लकड़ी का सार और इसकी जड़े सुगन्धित , हलके पीले रंग की और तेलयुक्त रहती है। इसकी लकड़ी को जलाने से उसमे से एक प्रकार का तेल टपकता है जिसे केलोन का तेल बोलते है। यह बहुत पतला होता है। औषधि प्रयोग में देवदारु की सुगन्धित लकड़ी , कोमल डालियाँ , पत्ते और केलोन का तेल काम में आता है। इसकी लकड़ी से पैकिंग करने से बॉक्स भी बनाये जाते है जो सारे भारत वर्ष में पैकिंग के काम में आते है।

  • देवदारु के अन्य नाम
  • देवदारु के गुण
  • देवदारु के उपयोग

(और भीं पढ़ें – अगर के गुण और उपयोग )

देवदारु के अन्य नाम

  • हिंदी – देवदारु
  • संस्कृत – सुरदारु , भद्रदारु , देवकाष्ट , अमरदास , इंद्रवृक्ष , दंदरदारु , मस्तदारु इत्यादि
  • बंगाली – देवदारु
  • मराठी – देवदार
  • गुजराती – देवदार
  • कन्नड़ – चोपरादेदार
  • पंजाबी – केलु

देवदारु के गुण

  • आयुर्वेद – देवदारु दो प्रकार को होता है। एक स्निगंधदारु और दूसरा काष्टदारु।
  • स्निग्ध – चरपरा , गर्म , चिकना , कड़वा , हल्का। वात , कफ , प्रमेह , कब्जियत , बवासीर , श्वाँसदोष , आफरा , ज्वर , खाँसी , सूजन , हिचकी , तन्द्रा , रुधिर विकार , पीनसरोग , खुजली , आमदोष आदि को दूर करने वाला।
  • काष्ठ – कड़वा , गर्म , रुखा। कफ एवं वातरोग के साथ-साथ भूतबाधा दूर करता है।
  • यूनानी – कड़वी , मूत्रल , शानदिायक एवं कफनिस्सारक है। यह गठिया , सन्धिवात , बवासीर , पथरी , पक्षाघात , गुदाभ्रंश आदि को करने वाला है।
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देवदारु के उपयोग 

  • इसका तेल पिलाने से पारे का विषैला प्रभाव दूर होता है।
  • इसका तेल पीने से रक्तविकार और चर्मरोग मिटता है।
  • लकड़ी घिसकर कनपट्टियों में लगाने से सिरदर्द दूर होता है।
  • इसके लकड़ी के चूर्ण का दो माशा 5 माशा गुड़ के साथ खाने से सीने का दर्द दूर होता है।
  • इसके क्वाथ में गौ मूत्र मिलाकर से अंडकोष की वृद्धि में आराम होता है।
  • इसके चूर्ण को बकरी के दूध में खाने से नेत्रज्योति बढ़ती है और नेत्र के विकार दूर होते है।
  • चित्रक के साथ पीसकर लेप करने एवं गायय के मूत्र के साथ पीने से फिलपाँव में लाभ होता है।

मात्रा – चूर्ण 3 से 6 माशे ; तेल – 1 से 2 माशे

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