दोपातीलता के गुण

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Dopatilta
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यह रेतीले समुद्री किनारे पर उत्पन्न होती है। यह वनस्पति की बेल होती है। इसकी बेलें सौ-सौ फुट लम्बी होती है। इसके पत्ते आसुंदरे के पत्तों के समान होते है। यह चिकने चमकदार और मोटे होते है। फूल गुलाबी और बैंगनी रंग के बड़े-बड़े घंटाकार होते है। फल गोलाई लिये हुए अणीदार होते है। हर एक फल में 4 खंड सख्त होते है। यह वनस्पति समुद्र के रेतीले किनारों पर ऐसे स्थान पर पैदा होती है , जहाँ दूसरी वनस्पतियाँ पैदा नहीं होती।

  • दोपातीलता के अन्य नाम
  • दोपातीलता के गुण

(और भीं पढ़ें – काई के गुण और उपयोग )

दोपातीलता के अन्य नाम

  • हिंदी – दोपातीलता , कर्याबेल
  • संस्कृत – मर्यादा , मन्मथा , मारवलली , रक्त पुष्पा , सागर मेखला , युग्मपत्रा
  • बंगाली – छागल कुरी
  • गुजराती – आरवेल , मर्याद वेल , दरिया वेल
  • मराठी – मर्याद बेल
  • तेलगू – बला बणिड़टिग
  • तामील – अदम्बु , अकप्पन गोड़ी।
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दोपातीलता के गुण

  • आयुर्वेद – आयुर्वेदिक मत से दोपातीलता शीतल , मलरोधक , सारक , भारी , पचने में चरपरी , वातकारक और हैजा , शूल , वनम और आम को दूर करती है।
  • इसके सेवन से वन्ध्यत्व दूर होती है। जलोदर पर इसके रस को पिलाने और लगाने से लाभ होता है। इसके पत्तों को पीसकर फोड़े-फुन्सी और गठनो पर बाँधने से या तो वे फूट जाते है या बैठ जाते है। कारबडकल या पाठे की बीमारी में भीं इसके पत्ते , फूल को पीसकर कुछ नमक डालकर , बाँधने से लाभ होता है।
  • सन्धिवात पर इसके पत्तों को पीसकर लेप करने से फायदा होता है। जलोदर में इसका रस मूत्रल औसधि की तरह दिया जाता है और साथ ही इसके पत्तों को कुचल कर लजोबर की जगह पर बाँधा भी जाता है।

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