काई के गुण और उपयोग

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Kai
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यह जमे हुए पानी , गड्ढे एवं तालाबों में हरी काई के समान सतह पर उत्पन्न होकर फैली रहती है। यह इतनी महीन वनस्पति होती है कि पानी हरा गंदला लगता है। यह समुद्र में भीं उत्पन्न होती है।

  • काई के अन्य नाम
  • कई के गुण
  • काई के उपयोग

(और भीं पढ़ें – अगस्त के गुण और उपयोग )

काई के अन्य नाम

  • हिंदी – काई , शैवाल
  • संस्कृत – शैवाल
  • सिंध – लेबाला
  • मराठी – शेंवर
  • अरबी – तहल्लि
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काई के गुण

आयुर्वेद – यूनानी मत से यह दूसरे दर्ज से सर्द और तर है। समुद्र में पैदा होने वाली काई गर्म और खुश्क होती है। किसी स्थान से अगर खून बहता हो तो इसका लेप करने से या जौ के आटे के साथ इसको मिला कर चिपका देने से बंद हो जाता है। गर्मी की वजह से होने वालीं सूजन में और बच्चो से अंड वृद्धि में भी यह लाभदायक है। आयुर्वेद के मत से काई ठंडी , हजम होने से हलकी और चिकनी होती है। यह प्यास , बुखार की खुश्की और गर्मी के जखम को मिटाती है।

काई के उपयोग

  • काई के चूर्ण 3 माशे रोज कई दिनों तक लेने से औरत को संतान होना बंद हो जाता है। सूखी काई के चूर्ण को लेने से बच्चों के हरे पिले दस्त आना बंद हो जाते है।
  • वीर्य का पतलापन काई को एक मिटटी के ठीकरे में भर आग पर चढ़ाकर भस्म कर लेना चाहिए। उस भस्म में बराबर की मिश्री मिलाकर चूर्ण कर लेना चाहिए। इस चूर्ण को 4 माशे की मात्रा में रोजाना से लेने से वीर्य का पतलापन और प्रमेह मिटता है।
  • काई को निचोड़कर उसका पानी मूत्रेन्द्रिय के छेद में टपकाने से सुजाक का घाव भर जाता है।

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