कंज के गुण और उपयोग

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Kanj
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यह वनस्पति कोकण , मद्रास प्रेसीडेन्सी , सिलोन , कुमाऊँ और भूटान में पाँच हजार की फ़ीट ऊँचाई तक , खासिया पहाड़ी पर छह हजार फ़ीट की ऊँचाई तथा सुमात्रा , जावा , चाइना इत्यादि देशों में पाई जाती है। यह एक प्रकार हमेशा हरी रहनेवाली पराश्रयी लता है। इसका छिलका हलका , बदामी और फिसलना होता है। इस पर हलके काँटे रहते है। इसकी पत्तियाँ लम्बी और अंडाकार होती है। इसके फूल फीके हरे तथा पीले रंग के होते है , इसका फल लम्बा गोल और पीला होता है। इसमें कई बीज रहते है।

  • कंज के अन्य नाम
  • कंज के गुण
  • कंज के उपयोग

(और भीं पढ़ें – आम्बोली के गुण )

कंज के अन्य नाम

  • हिंदी – काली वनमिर्च , कंज , दहन
  • संस्कृत – वनमिर्च , कंचनफल , दहना
  • बंगाली – कड़तोदली , महाराष्ट्रियन
  • मराठी – जंगली काली मिर्च , लिमरो , मेंगर
  • तमिल – कटुमिलंगु
  • तेलगू – कोऊँकसीडा , बलयालम , काकतुलसी
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कंज के गुण

  • आयुर्वेद : मिर्च गर्म , सुगन्धित , दीपन वायु , को नष्ट करनेवाली , उत्तेजक , पसीना लानेवाली , ज्वरनाशक , पाय्यरयिक ज्वरों को रोकनेवाली और वातकारक होती है। इसका ज्वरनाशक धर्म दारुहल्दी के समान होता है। क्योंकि दारुहल्दी में पाया जानेवाला बरबेराइन नामक तत्व थोड़ी मात्रा में इसमें भी पाया जाता है। इसका उत्तेजक और छोटे की वायु को नष्ट करने का धर्म बहुत प्रभावपूर्ण होता है।
  • मलेरिया ज्वर में यह एक ध्यान खींचनेवाली वस्तु है। सिनकोना और दारुहल्दी के सामन यघपि यह वास्तु तत्काल असर नहीं करता है , फिर भी सिनकोना या कुनैन से होनेवाली त्रासदायक प्रतिक्रियाएँ इससे नहीं होती। इस औषधि को देने से पसीना बहुत आता है पर इसके पसीने से रोगी को थकावट नहीं आती , बल्कि और उत्तेजना मिलती है।

कंज के उपयोग

  • इसकी जड़ की छाल को पीसकर मलेरिया में प्रयुक्त किया जाता है। कहते है कि इसका प्रभाव कुनैन के समकक्ष होता है और साईड एफेक्ट नहीं होता।
  • इसके जड़ के चूर्ण को गर्म पानी के साथ लेने से अजीर्ण , क्षुधाहीनता आदि का नाश होता है।

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